Monday, March 26, 2012

What a shame

Recently while surfing I read an article about a village lady the story had been hounding me since.It was titled 'Age no bar to Independence : Karupayee .It was a story about a 101 year old  granny who was a NREGS worker from Madurai district.Her eldest son is 80 yrs of age .

Hats off to her across the nation there will be very less who could make to this age and still work .This might be a matter of great pride for the lady but isn't it shameful that the society is letting her work what about the youth and what a plight in the same country we see growing beggars in their teens !

We should take pledge to save her and others like her in our society at least now.She should have got food and amenities without toiling in the sun.Is it that expensive a deal ,probably one night at a bar with friends will cost much more than her supplies for a month .

We should give a thought at least !

Sunday, March 25, 2012

Tolerate

"People have a tendency to accept" ,we hear the sentence a lot of time .But have we ever thought from where we got this thing tolerance .Why now a days it is getting tougher for people to tolerate ?


The ability to live with or to bear or put up with is the right meaning .  Is it the freedom which is wrongly interpreted and thus tolerating is taken as intruding one's freedom .Look at all the great people across the world from Lincoln ,Martin Luther to our own Gandhi Ji and we can understand tolerance .Now a days in business too we tolerate risk and sometimes tolerate losses made by near and dear ones with our hard earned money or other important things  .


Tolerance is not seen as a grant of freedom ,to tolerate other persons behaviour is seen as a mild form of disapproval .They mean letting the other person do what ever he want to here he might hurt you but you don't have to retaliate and that is your tolerance .India is a tolerant nation where as America isn't .In long run tolerance pays Parents should teach there child to tolerate .tolerance can make the world run smoothly .

Saturday, March 24, 2012

Agent Vinod :Review

                               
Last night I went to watch a movie after about four weeks .It was much of a masala flick with scenes reminding of an English movie .skimpy dressed Russian girls Mafia everything .
The first half was a bit slow and the storyline couldn't catch up the pace require. All the villains about 4 to five didn't get much to do Ram Kapoor ,Gulshan were just there for one shot each .Movie Has more style than substance.Our hero is everywhere from Russia to Pakistan to Delhi and even for disarming the bomb that was more filmy.

Now coming to heroine Kareena disappoints with pale face and filthy body particularly in  bed scene with saif where her back fat is oozing between saif's fingers terrible .In her only action scene as an ISI agent kareena failed the only shot she misfires . Songs were badly placed Pyaar ki pungi was in the end with titles as to cut the length .The story was lengthy some scenes could have avoided .more of a bad Hindi remake of bond film with a  guarantee to get confused.

It was nice to watch Prem Chopra after a long Saif did a good job .Pungi and Mujra 'dil mera muft ka were nice and of course location were great .It will equally disappoint the front rowers and the sofa seaters with its length and lot of sequences overall Ultra slick and Ultra stylish Not worth !!!

Friday, March 23, 2012

सफाई

घोटाले ..................और भारत सरकार एक दुसरे का पूरक लगते है ।बोफ़ोर्स से ले कर टेलिकॉम , थ्री जी और अब कोयला नजाने कितने और अभी बाकि है ।ये पैसे की भूख गरीब को रोटी नहीं और इन्हें नोट रखने की जगह कम पड़ रही है ।
वैसे दोषी हम आम कही जाने वाली जनता भी है ।हम खुद इतने आलसी और पैसे कमाने में मगन है की अपना भला बुरा नहीं सोच सकते या यु कहे की हमने अपनी सोच इतनी छोटी करली।


सरकारे हमारी ,न्यायपालिका हमारी,मीडिया बिकाऊ है ,पुलिस हमारे इशारे पर काम करती है और जनता उसका क्या वोतो सिर्फ वोट देती है और अपने काम ने लग जाती है !.......शायद यही सोच कर हर सरकार     ,जी हां
 हर सरकार लूट खसोट करने से बाज नहीं आती ।


समय आया था जब लोग एक जुट हुए पर एक आदमी से शुरुवात तो होसकती है   मगर     हौसला हिम्मत हर एक को दिखानी पड़गी ।    सब को सड़क पर उतरना जरुरी नहीं , मन में ठान लें और जिस किसी  भी दफ्तर, सरकारी आदमी से काम पड़े रिश्वत न दे  ! काम समय पर ना हो तो शिकायत करे , ये न सोचे की छोटे से काम के लिए मै क्यों शिकायत कर झमेले में फसू ...अरे भाई देश अपना घर है और सफाई के लिए हमें ही झाड़ू उठाना है ।

Thursday, March 22, 2012

कोशिश ....दूर की कौड़ी

 मंजूनाथन से लेकर सत्येन्द्र दुबे या यशवंत सोणावठे  जैसे किसी ने भी अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते जब इन आजकल के कंसो के हाथों जान देदी तब शायद ही कोई तूफान भारतीय युवा के मन में उठा हो | हाँ क्रिकेट के मैदान की हार युवा मन में मातम पैदा जरुर कर सकती है | मूवी के सितारे कही कही भगवान की तरह मंदिर बनाकर पूजे जाते है | उनका बलिदान का गुणगान करने कि फुर्सत किसी को नहीं बची है |३३ वर्षीय युवक अनिल जेथवा को गुजरात हाई कोर्ट के परिसर में ही गोली मार दी गयी। जिसके बाद अनिल की मौत हो गयी। अनिल की गलती सिर्फ ये थी कि उन्होंने गिर फॉरेस्ट एरिया में गैरकानूनी रूप से माइनिंग करने वालों के खिलाफ आवाज उठानी चाही थी। ऐसे कितने ही नाम हैं जिन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने के बदले मौत मिली और भारत में ऐसे हर व्हीसिल ब्लोवर की मौत के बाद व्हीसिल ब्लोवर एक्ट का थोड़ा हल्ला मचाया जाता है और फिर सारा मामला शांत हो जाता है।

५० वर्षीय विक्रम लक्ष्मण दोदिया एक दुकान के मालिक थे। इन्होंने आरटीआई के उपयोग से सिर्फ ये जानना चाहा था कि शहर में कितने बिजली के कनेक्शन गैरकानूनी तौर से चलाए जा रहे हैं। सूचना तो नहीं मिली लेकिन पर्दा फाश होने के डर से दोदिया को जान से मार डाला गया। सतीश शेट्टी भी ऐसे ही शक्स थे। ३८ वर्ष की उम्र में इन्होंने शहर में हो रहे भूमि द्घोटालों को सबके सामने लाने की ठान ली थी। परिवार को धमकियां मिलने के बाद भी सतीश का हौसला टस से मस नहीं हुआ। नतीजा ये हुआ कि १३ जनवरी को इनकी भी हत्या कर दी गयी। ऐसी हत्याओं में पैसे और रुतबे वाले लोग शामिल होते हैं। इसलिए बहुत कम मामलों में ही दोषियों को सजा होती है। दोदिया मामले में उनके परिवार वालों का कहना था कि जिस दिन दोदिया की हत्या हुई उस दिन उन्हें पुलिस स्टेशन बुलाया गया जहां उन्हें पीछे हटने के लिए पैसे देने का वादा किया गया। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा चुके दोदिया ने नेताओं और अफसरों की तरह बिकना पसंद नहीं किया। इसके बाद द्घर आते समय रास्ते में ही कुछ लोगों ने उन्हें मार दिया। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा कि ऐसे कई मामलों में खुद पुलिस भी शामिल होती है।  

भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने और देश को भ्रष्टाचारियों से मुक्त करने की कोशिश करने वालों को पुरुस्कृत करना तो ..है कम से कम सरकार को ऐसे लोगों की सुरक्षा के बारे में तो सोचना चाहिए। चाहे एक सामान्य कंपनी में कार्यरत मंजुनाथन हो या एडीएम जैसे पावरफुल औदे पर काम कर रहे सोणानठे ।

सोणावठे की हत्या के ४८ द्घंटे भी नहीं हुए थे कि एक और आरटीआई कार्यकर्ता को अपनी जान गवांनी पड़ी। अमरनाथ पांडे जो कि ५५ वर्ष के थे और कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते थे, उन्हें भी भ्रष्टाचार के दंश ने डस लिया। आरटीआई के तहत अमरनाथ पांडे ने डेवलपमेंट ब्लॉक के अफसरों द्वारा की जा रही ३० लाख की धांधली को पकड़वा दिया था। इस पर अमरनाथ पांडे को मरवा दिया गया। देश में भ्रष्टाचार इतना ताकतवर हो चुका है कि इसके खिलाफ उठने वाली सभी आवाजों को बेरहमी से कुचल दिया जाता है।

Wednesday, March 21, 2012

एक तख़्ती

आपको 'दीवार' फ़िल्म का अमिताभ बच्चन याद है, जिसके हाथ पर लिखा होता है, मेरा बाप चोर है उसमें एक ऐसे परिवार के साथ समाज की एक कहानी रची थी जिसका दोष सिर्फ़ ग़रीबी था  आज कल देश की सरकारों ने ग़रीबों को ज़लील करने का एक नया तरीक़ा ढूँढ़ निकाला है।


राजस्थान सरकार ने ग़रीबी रेखा के नीचे रह रहे लोगों के घरों से सामने एक तख़्ती लगाने का फ़ैसला किया है जिससे कि पहचाना जा सके कि वह किसी ग़रीब का घर है ।सरकार का तर्क है कि इससे लोग जान सकेंगे कि कौन सा परिवार सरकार की दो या तीन रुपए किलो चावल की योजना का लाभ उठा रहा है। उनके अनुसार इससे यह पहचानने में भी आसानी होगी कि टीवी,फ़्रिज और गाड़ियों वाले किन घरों के मालिकों ने अपने को ग़रीब घोषित कर रखा है।



लेकिन उन ग़रीबों का क्या जो आज़ादी के 63 साल बाद भी सिर्फ़ इसलिए ग़रीब हैं क्योंकि इस देश की और प्रदेशों की कल्याणकारी सरकारों ने अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाई? क्या सरकार को हक़ है कि वह ग़रीब रह गए लोगों का इस तरह से अपमान करे? इससे एक बात तो साफ़ है,कि जिन सरकारों को शर्मिंदा होना चाहिए कि वह ग़रीबी दूर नहीं कर पा रही हैं इसलिए मुआवज़े के रुप में दो या तीन रुपए किलो में चावल दे रही हैं, वही सरकारें ग़रीबों पर अहसान जता रही ।


 जिस समय योजना आयोग के आँकड़े कह रहे हैं कि ग़रीबों की संख्या वर्ष 2004 में 27.5 प्रतिशत थी जो अब बढ़कर 37.2 प्रतिशत हो गई है, देश में किसानों की आत्महत्याएँ रुक नहीं रही हैं और जिस समय ख़बरें आ रही हैं कि ग़रीबी उन्मूलन का पैसा राष्ट्रमंडल खेलों में लगा दिया गया है ।उसी समय सरकारी आंकड़ों में यह भी दर्ज है कि देश के उद्योगपतियों और व्यावसायियों ने बैंकों से कर्ज़ के रूप में जो भारी भरकम राशि ली उसे अब वे चुका नहीं रहे हैं। यह राशि, जिसे एनपीए कहा जाता है, एक लाख करोड़ रुपए से भी अधिक है। देश की सौ बड़ी कंपनियों पर बकाया टैक्स की राशि पिछले साल तक 1.41 लाख करोड़ तक जा पहुँची थी क्या किसी राज्य की सरकार में यह हिम्मत है कि वह किसी बड़े औद्योगिक घराने या किसी बड़ी कंपनी के दफ़्तर के सामने या फिर उसके मालिक के घर के सामने यह तख़्ती लगा सके कि उस पर देश का कितना पैसा बकाया है?



जिस तरह सरकार को लगता है कि ग़रीबों का घर पहचानने के लिए तख़्ती लगाए जाने की ज़रुरत है उसी तरह देश के आम लोगों का पैसा डकारने वालों के नाम सार्वजनिक करने की भी ज़रुरत है लेकिन सरकारें ऐसा नहीं कर सकतीं क्योंकि यही उद्योगपति और व्यवसायी तो राजनीतिक पार्टियों को चंदा देती हैं और यही लोग तो मंत्रियों और अफ़सरों के सुख-सुविधा का ध्यान रखते हैंअगर एक बार कथित बड़े लोगों से बकाया राशि वसूल की जा सके तो इस देश में ग़रीबी दूर करने के लिए बहुत सी कारगर योजना चलाई जा सकती है लेकिन साँप के बिल में हाथ कौन डालेगा और क्यों डालेगा?

Tuesday, March 20, 2012

बेबाक बात

सुना था, बाते करना और बेबाक बाते करना अलग अलग फलसफा है ।मगर लगता है ये सटीक आंकलन नहीं है
मेरे ख़याल में, इंसान यदि बोले, दिल ख़ोल के बोले तो शुरू में  जाहिर है गलतिया करेगा । मगर जनाब अपनी राय, अपनी बात, अपनी सोच दूसरे तक तो पंहुचा सकेगा और हाँ, धीरे धीरे परिपक्व हो जायेगा ।वैसे बेबाकी और उद्दंडता में धागे भर का ही फर्क होता है धागे के इंगे बेबाकी बिंगे उद्दंडता !!!


ढीट होना आज वक़्त की जरुरत बन गई लगता है अन्यथा लोग आपका अस्तत्व नकारने में समय नहीं लगायेगे ।कई लोग इसी हुनर से कमा खा रहे है ।बेबाक बात करने के नतीजे हमेशा बुरे ही होगे यही पुरानी विचारधारा थी क्युकी उस वक़्त राजाओ ,सामंतो का जमाना था परन्तु आज देश आजाद है वर्ण व्यवस्था बदल रही है आज कोई किसी का दास नहीं । पर फिर भी दूरांत गाव देहात में ये बेबाकी प्राण हनन का कारण तक बन जाती है ।


इसी भंवरजाल की वजह से संसार में दुराचारी हनानकारी लोगो की तादाद में वृद्धी की सुचना अब तब मिलती है ।बहर हाल होता आज भी बुरे का अंत ही है मगर आज इंसान अंत की नहीं वर्तमान हतु जीना सीख चूका है इसलिए भगवान् का खौफ भी नहीं रहा ।समाज को चाहिए की माता पिता संस्कार अनुशासन सच्चाई आदर्शो के लिए जीने की सीख दे सद्भावना मेह्नत का मोल सिखाये न की पैसे और आराम के पीछे भागना ।