Friday, January 6, 2012

आटोएक्सपो 2012


ऑटो एक्सपो-2012


5 से 11 जनवरी 2012 के दौरान आयोजित होने वाले इस 11वें ऑटो एक्सपो में देश के वाहन और कलपुर्जों के निर्माता तो बड़े पैमाने पर भाग लेंगे साथ ही 24 देशों से 1,500 कंपनियों और प्रदर्शक भी भाग लेंगे.यह 11वां आटोएक्सपो है.प्रदर्शनी में बेलारुस,कनाडा,चीन, फ्रांस, जर्मनी, हांगकांग, जापान, मलेशिया,नीदरलैंड, पुर्तगाल,रुस,स्विटजरलैंड, सिंगापुर,थाइलैंड,तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात से कई बड़े वाहन निर्माता और कलपुर्जों के निर्माता ऑटो एक्सपो में शामिल.


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पूरी दुनिया का ध्यान भारतीय आटोमोटिव उद्योग की तरफ है और शायद यह अपने चरम पर . वैश्विक मंदी के इस दौर में आटो एक्सपो के आर्थिक परिवेश में नया जोश भरने की उम्मीद है.इसमें पेट्रोल और डीजल से आगे बढ़कर इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड मोबिलिटी जैसे नई तकनीक के वाहन भी उतारे जायेंगे.


होंडा की नई कार
पहले दिन लगभग 40 कार, बाइक और कॉमर्शियल वाहनों की लांचिंग हुई .मंदी के दौर में ये तोहफा है खास मध्यमवर्गीय खरीददारों के लिए. ऑटो एक्सपो में अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां लेकर आई हैं छोटी गाड़ियों के नए मॉडल्सवैसे छोटी गाड़ियों की रानी माने जाने वाली मारुति भारतीय बाज़ार में इस अंतर्राष्ट्रीय मुकाबले के लिए तैयार है.छोटी कारें उतार रही है मारुति , स्मॉल कार टेक्नोलॉजी का कमाल होंगी और 660 सीसी इंजिन से चलेंगी .


कारों के शौकीन लोगों के लिए भी कुछ खास है. मर्सिडीज़, ऑडी और बीएमडब्ल्यू, तीनों कंपनियां एक करोड़ से महंगी गाड़ियां बाज़ार में उतार रही हैं. .ऑटो एक्सपो में 20 लाख से भी ज़्यादा लोगों के आने की उम्मीद है.

Thursday, January 5, 2012

चिठ्ठी आई है .....सात समुंदर पार गया तू, हमको जिंदा मार गया तू ......चिठ्ठी आई है.

संचार क्रांति के इस दौर में खास तौर पर महानगरों में ऐसी  धारणा बनती जा रही है कि अब चिट्ठियों का कोई महत्व नहीं रहा। उनको मोबाइल फोनों, यातायात के तेज साधनो, इंटरनेट और तमाम अन्य माध्यमो ने बुरी तरह प्रभावित किया है। पर इतने सारे बदलाव के बाद भी चिट्ठियों का जादू खास तौर पर देहाती इलाकों में कायम है और डाकखानो के द्वारा रोज भारत में साढे चार करोड चिट्ठियां भेजी जा रही हैं। भारतीय सैनिकों के बीच रोज सात लाख से अधिक चिट्ठियां बांटी जा रही हैं और आज भी देश के तमाम दुर्गम गावों में डाकिए का उसी बेसब्री से इंतजार किया जाता है जैसा दशको पहले किया जाता था।




संचार क्रांति के क्षेत्र में भी शहर और देहात के बीच  भारी विषमता गहरा रही है।  देश में हर माह 70 लाख से एक करोड के बीच में फोन लग रहे हैं फिर भी  देहाती इलाकों की तस्वीर बहुत धुंधली है। देहाती फोनो का जिम्मा आज भी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बीएसएनएल ने ही संभाला है और निजी कंपनियां इन इलाकों में जाने से कतरा रही हैं। भले ही 28  करोड से अधिक फोनो के साथ भारत का दूरसंचार नेटवर्क दुनिया का तीसरा और एशिया का दूसरा सबसे बडा नेटवर्क बन गया है।  पर दहातीं दूरसंचार  घनत्व अभी 9 फीसदी भी नहीं हो पायाहै। अगर ग्यारहवीं योजना के अंत तक की गयी परिकल्पना के अनुसार ग्रामीण दूरसंचार घनत्व बीस करोड फोनो के साथ 25 फीसदी हो जाता है तो भी भारत में देहात के 100 में 75 लोगों के पास फोन नहीं होंगे।




पत्रों के आधार पर ही तमाम भाषाओं में जाने कितनी किताबें लिखी जा चुकी हैं और राजनेताओं के पत्रों ने विवादों की नयी विरासत भी लिखी। पत्र व्यवहार की परंपरा भारत में बहुत पुरानी है। माध्यम डाकिया रहा हो या हंस ,हरकारा रहा हो या फिर कबूतर पर पत्र लगातार पंख लगाकर उडते रहे हैं।  नल -दमयती  के बीच पत्राचार हंस के माध्यम से होता था तो रूक्मिणी का पत्र श्रीकृष्ण को विपृ के माध्यम से मिलता था। माक्र्स और एंजिल्स के बीच ऐतिहासिक मित्रता का सूत्र पत्र ही थे।  इसी तरह रवींद्र नाथ टैगोर ने दीन बंधु एंड्रूज को जो पत्र लिखा था वह लेटर टू ए  फ्रेंड नाम से एक किताब का आकार लेने में सफल रही




दुनिया का सबसे पुराना ज्ञात पत्र 2009 ईसा पूर्व के कालखंड का सुमेर का माना जाता है।  मिट्टी की पटरी पर यह पत्र लिखा गया था। मनुष्य की विकास यात्रा के साथ पत्रों का सिलसिला भी शुरू हुआ और आदिवासी कबीलों ने संकेतो से संदेश की परंपरा शुरू की। लिपि  के आविष्कार के बाद पत्थरों से लेकर पत्ते पत्रों को भेजने का साधन बने। लेखन साधनो तथा डाक प्रणाली के व्यवस्थित विकास के बाद पत्रों  को पंख लगे । अगर तलाश करें तो  आपको ऐसा कोई नहीं मिलेगा जिसने कभी किसी को पत्र न लिखा या न लिखाया हो या पत्रों का बेसब्री से जिसने इंतजार  न किया हो। भारत में सीमाओं और दुर्गम इलाकों में तैनात हमारे सैनिक तो पत्रों का बहुत आतुरता से इंतजार करते हैं। संचार के और साधन उनको पत्रों सा संतोष नहीं दे पाते हैं। एक दौर वह भी था जब लोग पत्रों का महीनो इंतजार करते थे.पर अब वह बात नहीं।




भारतीय डाक तंत्र ने नीति निर्माताओं की तमाम उपेक्षा के बाद भी  खास तौर पर देहाती और दुर्गम इलाकों में पत्र भेजने के साथ साक्षरता अभियान तथा समाचारपत्रों को ऐतिहासिक  मदद की पहुंचायी है।  रेडियो के विकास में भी डाक विभाग का अहम योगदान रहा है। मनीआर्डर, डाक जीवन बीमा तथा डाकघर बचत बैंक खुद में बडी संस्था का रूप ले चुके हैं। यही नहीं कम ही लोग जानते हैं कि नोबुल पुरस्कार विजेता सीवी रमण, मुंशी प्रेमचंद, अक्कीलन, राजिंदर सिंह बेदी, देवानंद, नीरद सी चौधरी, महाश्वेता देवी  से लेकर कृष्णविहारी नूर डाक विभाग में कर्मचारी या अधिकारी रहे हैं 

Wednesday, January 4, 2012

2014 का कर्मयुद्ध

                                     
मनमोहन का कार्यकाल विवादों और भ्रष्टाचार के आरोपों से   है. राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले के साथ शुरू, हर कुछ महीने एक नया आदर्श सोसायटी घोटाले और सभी का सबसे बड़ा, 2G घोटाले की तरह बाहर आने के घोटाले देखा. ईंधन और वस्तु की कीमतों में तेजी से पिछले कुछ वर्षों में आम आदमी की मुसीबतों को जोड़ने बढ़ी है. अन्ना हजारे द्वारा और कुछ हद तक बाबा रामदेव को काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ धर्मयुद्ध केवल कांग्रेस के संकट .


बिहारी वाजपेयी के रूप में सबसे लोकप्रिय  नेता अब सक्रिय राजनीति से सेवानिवृत्त है. दिग्गज  नेता और आधुनिक भारत का चेहरा, प्रमोद महाजन एक दुखद घटना में मारा गया था. गोविंदाचार्य और जसवंत सिंह जैसे दिग्गज बाहर फेंक दिया गया. प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मुरली मनोहर जोशी के लिए राष्ट्रीय स्तर की राजनीति पर कोई प्रभाव के साथ किनारे पर बैठ किया गया है. लालकृष्ण आडवाणी सेवानिवृत्ति साल के करीब है और तेजतर्रार सुषमा स्वराज अभी तक एक विजेता हो साबित नहीं हुआ है. नरेंद्र मोदी, जो अभी तक गुजरात छोड़ने के लिए और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में शामिल होने के लिए तैयार नहीं किया जा सकता है के साथ पार्टी छोड़ देता है.


हालांकि कांग्रेस अभी तक यह स्वीकार नहीं है, लेकिन हो सकता है मनमोहन सिंह को दरवाजा दिखाया जा सकता है बाहर है, और कांग्रेस ने अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में 2014 में क्षेत्र राहुल गांधी के लिए पसंद कर सकते हैं. यह भी  राष्ट्र के रूप में वह अपने राजनीतिक .... अभी तक सिद्ध नहीं किया गया नेतृत्व राहुल हो सकता है, लेकिन  यूपीए भीड़ है... नकारात्मक समीक्षाओं के बाद, कांग्रेस एमी के मनमोहन सिंह नहीं  चाहते हैं. भाजपा के लिए के रूप में पसंद लालकृष्ण आडवाणी और लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी के लिए एक आखिरी कोशिश के बीच हो सकता है.


ममता ने बागी तेवर दिखने शुरू कर दिए बंगाल मे इन्द्रा भवन का  नाम बदलने की बात कर के वही जयललिता कह चुकी है की 2014 का चुनाव उसके द्वारे तय होगा .सपा , बसपा क्षत्रिय नेता लोकपाल की  हवा चला  उपयोग करे भ्रष्टाचार और घोटाले चुनाव प्रचार के मुख्य केंन्द्र दो साल पहले  से  बना रहे हैं .

Tuesday, January 3, 2012

विशेषाधिकार

मैं न तो अन्ना हज़ारे का अंध समर्थक रहा हूँ और न ही लोकपाल के मामले में सरकार के फ़ैसलों को हज़म कर पाया हूँ.अब जबकि संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त किया जा चुका है मैं कुछ हद तक टीम अन्ना की ज़िद को उनके नज़रिए से समझ पा रहा हूँ.विपक्ष रात भर बैठने की चुनौती देता रहा और सरकार ने दंभ भरे स्वर में कहा कि सत्र को लेकर फ़ैसला सरकार का 'विशेषाधिकार' है.यह अराजकता और तानाशाही दोनों का ही मिश्रित रूप है, लोकतंत्र तो कदापि नहीं.


यह विडम्बना है कि राजनीति में वे ही लोग हैं जो कान्तिहीन, श्रीहीन और प्रभाहीन हैं. इसलिए इनका कोई प्रभाव होगा इसकी कोई सम्भावना ही नही है. इस तथ्य को ये लोग भलीभाँति जानते हैं इसलिए आज नोट फॉर वोट के लिए किसी दलाल टाईप व्यक्ति का इस्तेमाल करते हैं तो कल उसे जेल भिजवा देते हैं.यह किसी से छिपा नहीं है कि आज बहुमत कैसे हासिल किया जाता है?


एक तयशुदा नीति के तहत सदन में हंगामा करवाया गया और लोकपाल विधेयक एक बार फिर से लटक गया. टीम अण्णा के लोगों ने रामलीला मैदान में जो टिप्पणियाँ कीं उनके लिए ओमपुरी और किरण बेदी को विशेषाधिकार नोटिस थमा दिया गया. अब सदन के भीतर ही इन माननीयों ने किस क़दर सदन की गरिमा भंग की ये पूरे देश ने देखा. तो क्या सदन में छीना झपटी और लोकपाल विधेयक की प्रतियाँ फाड़ना ही इनके विशेषाधिकार हैं? अण्णा के आंदोलन ने अभी सिर्फ़ विराम लिया है, ख़त्म नहीं हुआ. एक बार फिर देश में अण्णा की आँधी ज़रूर चलेगी. क्योंकि अब जो हुआ है उसकी आशंका अण्णा को पहले से ही थी. इन नेताओं को देश जवाब देगा.

Thursday, December 22, 2011

शिल्प ग्राम उत्सव

  

कल माननीय राज्यपाल साहब के कर कमलो से पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के शिल्प ग्राम उदैपुर का  रजत जयंती वर्ष के दस दिनों तक चलने वाले उत्सव का रंगारंग आगाज़ हुआ |मरू भूमि के गाजी खान मंगनियार ने समां बाँध दिया ,गोटीपुआ नृत्य उड़ीसा ,महाराष्ट्र का शेर व् उत्तरप्रदेश का मयूर नृत्य  ख़ास थे |हरियाणवी घूमर ने भी सभी का मन मोहा |                                                                                 

 

देश की लोक कला, अनूठी शिल्प परंपरा के प्रोत्साहन तथा कलाकारों व शिल्पकारों को कला प्रदर्शन के लिये मंच उपलब्ध करवाने तथा शिल्प साधकों को शिल्प उत्पादों के विपणन के लिये बाजार उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से केन्द्र द्वारा उत्सव का आयोजन प्रतिवर्ष होता  है। दस दिवसीय उत्सव के दौरान अपरान्ह 12.00 बजे से हाट बाजार प्रारम्भ होगा जहाँ आगंतुकों को विभिन्न राज्यों के शिल्प उत्पाद देखने व खरीदने का अवसर मिलेगा। उत्सव के दौरान रोजाना शाम 6 बजे से मुक्ताकाशी रंगमंच ‘‘कलांगन’’ पर लोक कलाकारों द्वारा रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किया जायेगा।
हस्त शिल्प के बेमिसाल नमूने राजस्थान की कठपुतलियो से ले कर ओड़िसा के सीपिया व् आयल पेंटिंग अनायास ही मंत्रमुग्ध करती है | उत्सव में कालबेलिया, सिद्दी धमाल, गोवा का समई नृत्य, असम का कलात्मक बिहू नृत्य, तीजन बाई की पंडवाणी, पश्चिम बंगाल का लोकप्रिय नृत्य छाऊ,पंजाब का भांगड़ा, मणिपुर की युद्ध कला को प्रदर्शित करता थांग, मणिपुर का पुंग ढोल चोलम की प्रस्तुति, बड़े बच्चों को आकर्षित करने वाला सिक्किम का सिंगी छम, गोवा की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला देखणी नृत्य आदि ख्यातनाम रंगारंग प्रस्तुतियांदेखने को मिलेंगी|इन दस दिनों मे हम कई बार शिल्पग्राम की सैर करेंगे, मेरा पसंदीदा गन्ने का रस जो तेल की घाणी से बैल निकालते है सिर्फ इन्ही दस दिनों तक मिलता है |पूरे देश से लोक नृतक ,लोक कलाकार ,खान पान एक जगह पर मिलना सौभाग्य ही है |

Wednesday, December 21, 2011

All b'cos of ignorance

India and Russia have been great friends as nation states for six decades if the Soviet period is taken into account, but contacts between the two at the social level, and at the level of individuals, has been virtually nonexistent, although in both countries there has traditionally been substantial goodwill for one another. 


The recent controversy over the status of the Bhagavad Gita or the Gita, as the famous 3,000-year-old text is commonly known, as revealed from details of a case filed in a court at Tomsk in Siberia, doubtless owes much to this gap. It is a pity, nevertheless, that the Russian authorities are yet to squelch the problem.


During the Communist rule, the International Society for Krishna Consciousness (Iskcon) — which spreads the message of Lord Krishna’s teaching to Arjuna of not falling prey to illusory earthly bonds while performing one’s duty, the essence of the Gita — had come on the radar of the authorities in Moscow. The anti-religious state questioned all this on first principles, but, though there was also the underlying anxiety that no community organisation should emerge which furthered a cause other than the officially sanctioned version of Communism. Reportedly, Krishna’s message had slowly begun to attract adherents. In Russia, after the demise of the Communist state, it won’t be the authorities who would worry about the Gita but notables or followers of the local church, who might perceive competition.


It is laughable that the Gita should be challenged in a Siberian court as “extremist” literature. The truth is that it is not only a great text sacred to the Hindus, but also widely viewed in the world as a marvel of world literature and a heritage of humankind.

Sunday, December 18, 2011

मलमल के कुर्ते पे छीटे लाल लाल ...

"पान खाय सय्या हमारो ..या ..खाई के पान बनारस वाला ........" उस ज़माने और आज मे बहुत फर्क आ गया लगता है | हम उत्तर भारतीय एक ज़माने में भरपूर भोजन के बाद पान का लुफ्त लेना नहीं चूकते कहा जाता था की पान पाचन में सहायक है | कौन सा पत्ता‍ लेंगे ? यथा चालानी, कलकतिया, बनारसी , देशी या फिर मीठा पत्ता .... आज के पान के हिसाब को मेरे खाते में डाल दीजिए और पीछे का हिसाब भी जोड़ दीजिएगा... आज इस तरह का वार्तालाप मनो  ख़त्म सा होचला है |
पान या तांबुल का प्रयोग भारत में कब से हो रहा है नहीं पता, पर प्राचीन काल से ही इसका उल्लेख सामने आता रहा है। इसने वह स्थान प्राप्त किया हुआ है कि पूजा अर्चना में इसे भगवान को भी अर्पित किया जाता है। अपने गुणों की खातिर इसे हमारी दिनचर्या में भी जगह मिली हुई है। आयुर्वेद में भी इसका उपयोग लाभकारी बताया गया है।पान का पूरा लाभ लेने के लिये उसमें जरा सी मात्रा में चूना, कत्था, जायफल, लौंग, ईलायची तथा पक्की सुपारी ड़ाल उपयोग करना चाहिये। कच्ची सुपारी का सेवन हानीकरक माना जाता है।



 
पान के सेवन से मुंह का स्वाद ठीक रहता है, जीभ साफ रहती है, गले के रोगों में भी फायदा होता है तथा चूने के रूप में शरीर को कैल्शियम की प्राप्ति हो जाती है। इसका उपयोग खाना खाने के बाद ही फायदेमंद रहता है।


पर आज  पान' की लाली फीकी हो चली है। लबों पर लाली के लिए अब महिलाएं पहले की तरह पान खाना पसंद नहीं करतीं बल्कि सौन्दर्य प्रसाधनों का उपयोग करने लगी हैं। सो, पान का चलन कम हुआ है। पान के रसिया कम हो चले है और थैली बंद गुटखो ने धीरे धीरे  उनकी जगह ले ली है जो पान से ज्यादा घातक और नुकसानदेह है  लोग यहाँ तक कहते है की आज के  मिलावटी पान मसाले कई गुना ज्यादा घातक हैं। इन्होंने पान खाने वालों को सलाह दी है कि वे प्रतिष्ठित दुकानों से ही खरीद कर पान मसालों का सेवन करें। दुकानों से मंगाये गए पान के बीड़े से यथा संभव परहेज करना चाहिए।गांवों के किसान बढ़-चढ़कर पान की खेती करते थे पर अब पाला के साथ ही सरकारी अनदेखी के कारण कृषक इससे मुंह मोड़ने लगे हैं।पान के पत्तों की बढ़ती कीमत के कारण लोग गुटखा खाना ज्यादा पसंद करते हैं |