Sunday, March 18, 2012

फजीहत जनता कि !!!!!!!

समीकरण बदलते देर नहीं लगती ...समाजवादी पार्टी के खिलाफ दस दिन पूर्व खड़ी पार्टी कांग्रेस जिसने ममता का साथ दे बंगाल में चुनाव लड़ा वो धर्मनिरपेक्ष दल सुनने में आरहा है की ममता के दबंगई दिखाने के कारण मुलायम या यु कहिये अखिलेश  (स पा ) के साथ गठबंधन करने जा रही है ......कभी नाव  गाड़ी पर तो कभी गाड़ी नाव पर आज भारतीय लोकतंत्र के लिए ये मुहावरा सटीक लगता है ।


नेताओ के खरीद फरोक्त ,घोटाले बजी और अब टैक्स जड़ने  में माहिर , साथ ही  सरकार में शामिल किसी भी दल का नेता अपनी ही सरकार की किसी भी मुद्दे पर सार्वजनिक आलोचना कैसे कर सकता है ? इस से सरकार और सहियोगियो की किरकिरी हुई । खेर ......यह इस सरकार के लिए कोई नई बात नहीं .....केंद्र सरकार के लिए सबसे शर्मनाक क्षण वह था जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के रूप में पी जे थॉमस की नियुक्ति की अवैध करार दी। इसके बाद, प्रधानमंत्री को तब असहज होना पड़ा जब ए.राजा के मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय को हलफनामा देने के लिए कहा गया। अन्ना हजारे के आंदोलन से निपटने के तौर-तरीकों ने भी केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री की छवि को खासा नुकसान पहुंचाने का काम किया और मेरा मानना है की पांचो राज्यों के चुनाव में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन का श्रेय टीम अन्ना को भी है ,आज जनता समझदार है !


एंट्रिक्स-देवास सौदे में इसरो के पूर्व प्रमुख माधवन नायर समेत चार वैज्ञानिकों पर जिस तरह पाबंदी लगाई गई उससे देश को यही संदेश गया कि केंद्र सरकार ने एक पक्ष के लोगों के खिलाफ ही कार्रवाई की। खुद प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष ने वैज्ञानिकों के खिलाफ की गई कार्रवाई पर सवाल खड़े किए हैं। उम्र विवाद पर सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाले सेनाध्यक्ष को सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिली हो, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि इस मामले में सरकार का रवैया भी सही नहीं रहा।


दिनेश त्रिवेदी कही सुब्रमनियम स्वामी बनने की कोशिश तो नहीं कर रहे ? रेल बजट को लेकर केंद्र सरकार और तृणमूल के बीच जो तकरार हुई है, उसका अंत क्या होगा यह तो आने वाले वक्त में तय होगा,कुछ भी हो, इस प्रकरण ने केंद्र सरकार की साख को और कमजोर किया है। अगर सरकार ममता बनर्जी के आगे झुकती है, तो इससे उसकी छवि और ज्यादा खराब होगी। अगर वह ममता के आगे नहीं झुकती है, तो ममता यह कहकर मैदाने-जंग में आ सकती हैं कि आम आदमी के मुद्दे पर उन्होंने केंद्र से लोहा लिया। लेकिन इसने गठबंधन सरकारों की समस्याओं में एक नया आयाम जोड़ा है।लेकिन इन संघर्षों के लिए केंद्र सरकार और कांग्रेस में राजनीतिक प्रबंधन की कमी भी जिम्मेदार है। सहयोगियों और राज्य सरकारों की यह शिकायत है कि बड़े फैसले करने से पहले केंद्र सरकार उनसे विचार-विमर्श नहीं करती, इसलिए बार-बार टकराव के मौके आते हैं।


क्यों इस सरकार को सहयोगियों के हाथों अपनी और अपने नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता की फजीहत मंजूर है ?